शिक्षा का उद्देश्य जीवन निर्वाह नहीं निर्माण हो– आदर्शमति माता जी

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🔷शिक्षा का उद्देश्य जीवन का निर्वाह नहीं निर्माण करना हो– 105 आर्यिका रत्न आदर्शमति माता जी

🔴डोंगरगढ़- सरस्वती शिशु मंदिर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्रांगण में 105 आर्यिका रत्न आदर्शमति माता जी ने कहा कि गुरु जी– “तुम इस तरह उठे कि आसमान बन गये, सारे जहाँ के वास्ते ईमान बन गए, हम तुम्हारे सानिध्य में रहकर इंसान न बन सके और तुम हमारे मध्य रहकर भगवान बन गये।” गुरु जी कहते थे की शिक्षा का उद्देश्य केवल पैसा कमाना ही नहीं होता है, शिक्षा के साथ-साथ संस्कार की भी आवश्यकता होती है। आज की जो शिक्षा पद्दति है उसमें संस्कार को गौण कर दिया गया है इसलिए विद्यार्थियों को शिक्षा का उद्देश्य केवल धन कमाने और अच्छा पैकेज ही दिखाई देता है। जिससे देश में, समाज में, व्यक्ति का व्यवहार केवल स्वार्थ सिद्धि तक ही सिमित हो गया है और संस्कार ख़त्म होते जा रहा है। एक उदाहरण के माध्यम से समझाया की एक लड़की एक बड़े घर में काम करती थी उस घर के बेटे की शादी होने वाली थी जिसके लिए उस घर की मालकिन एक कपड़े की दुकान में जाकर कहती है की एक कम मूल्य की साड़ी दीजिये मुझे अपनी काम वाली को देना है और वह वहां से कम मूल्य की साड़ी ले लेती है। उसी दुकान पर वह कामवाली आती है और कहती है की मुझे महँगी वाली साड़ी लेना है मेरी मालकिन के बेटे की शादी है तो मालकिन को देना है। अब आप बताइये की बड़ा कौन हुआ। केवल ज्यादा पैसा कमाना या ज्यादा पैकेज मिलना ही बड़ा नहीं बनाता है, आपका व्यवहार ही आपको बड़ा या छोटा बनाता है। एक ख़राब डॉक्टर, ख़राब इंजिनियर, ख़राब वकील कुछ ही लोगों का नुकसान करते हैं जबकि एक ख़राब शिक्षक सारे के सारे विद्यार्थियों का जीवन ही ख़राब कर सकता है इसलिए गुरु का अपने जीवन में बहुत महत्व होता है। भारत पहले समृद्ध देश था क्योंकि यहाँ की संस्कृति, भाषा, संस्कार और गुरुकुल शिक्षा पदत्ति से विद्यार्थियों को शिक्षित करने का उद्देश्य केवल उनके जीवन का निर्वाह नहीं निर्माण करना होता था। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना जन मानस में व्याप्त थी। इन सभी उद्देश्य को लेकर शिक्षक ही विद्यार्थियों का जीवन का सृजन कर सकता है। जिससे समाज और देश फिर से अपनी समृद्धि हासिल कर सकता है।

कार्यक्रम का प्रारंभ श्री दिगम्बर जैन चंद्रगिरी अतिशय तीर्थ क्षेत्र के अध्यक्ष सेठ सिंघई किशोर जैन ने माँ सरस्वती के सामने दीप प्रज्वलित कर किया एवं माता जी को शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य सरस्वती शिशु मंदिर समिति के अध्यक्ष सुनील जैन (चीकू) को प्राप्त हुआ। ब्रह्मचारिणी शुभी दीदी ने अपने उद्बोधन में कहा की शिक्षा के साथ–साथ कौशल विकास की भी आवश्यकता होती है जिससे विद्यार्थी स्वावलंबी बनता है और भविष्य में अपने लक्ष्य की प्राप्ति के साथ–साथ अपने संस्कार, संस्कृति और देश के लिए भी कार्य करता है। कार्यक्रम के समापन में सरस्वती शिशु मंदिर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय डोंगरगढ़ के प्राचार्य प्रकाश यादव ने सभी उपस्थित जन को धन्यवाद ज्ञापित किया और माता जी के प्रवचन एवं उद्बोधन के लिए धन्यवाद दिया। उक्त कार्यक्रम में प्रतिभास्थली की ब्रह्मचारिणी दीदियाँ, जैन समाज के अध्यक्ष अनिल जैन, सचिव सुरेश चन्द जैन, चंद्रगिरी के कोषाध्यक्ष सुभाष चन्द जैन, प्रतिभास्थली के संयुक्त मंत्री सप्रेम जैन, राजेंद्र जैन, सुशिल जैन, गौरव जैन, श्री दिगम्बर जैन समाज की महिला मंडल अध्यक्ष साक्षी जैन, प्रभा जैन, शशि जैन, आशा जैन, त्रिशला जैन, प्रीति जैन और जैन समाज एवं सरस्वती शिशु मंदिर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय डोंगरगढ़ समिति के सदस्य जन उपस्थित थे। उक्त जानकारी निशांत जैन (निशु) द्वारा दी गयी।

डीजी न्यूज़ डोंगरगढ़

संपादक-विमल अग्रवाल

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