फेस पॉलिटिक्स और रेवड़ी कल्चर पर लगाम कब?

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जय राम????जय जोहार साथियों
????फेस पॉलिटिक्स के नाम पर फिजूल खर्ची सत्ता सरकार का शगल बन गया है।

????धर्मनगरी डोंगरगढ़ की नगरपालिका में इन दिनों हजारों की संख्या में नए राशन कार्ड बंटने के लिए तैयार है।

????एक ओर सरकारें पेपर लेस वर्क की बात करती है क्योंकि पर्यावरण संरक्षण करना है,पेड़ों को कटने से बचाना है, लेकिन अफसोस सरकार बदलते ही हर बार सिर्फ नई सरकार की फोटो के लिए नए राशन कार्ड जारी होते हैं।
????बार बार सत्ताधारी दल के द्वारा अपने चेहरे को चमकाने पर्यावरण को ताक पर रखना कहां तक उचित है? राशन कार्ड में जो पेपर लगता है क्या उसमें वृक्षों का कटाव नहीं होता?
????वर्तमान में प्रदेश की कुल आबादी लगभग 3.30करोड़ है और लगभग 75 लाख राशन कार्डधारी हैं ऐसे में इतने राशन कार्डों के नवीनीकरण में जितना खर्च आएगा उतनी राशि में प्रदेश की गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाली आबादी को एक महिनें का मुफ्त राशन मिल जाएगा फिर भी सिर्फ फेस पॉलिटिक्स के नाम पर इतना खर्च किया जाना समझ से परे है।
????आखिर क्या जरूरत है किसी नेता की फ़ोटो डालने की? इस भारी भरकम खर्च की भरपाई कैसे होगी? आखिर ये सत्ता सरकार ये राजनेता अपने चेहरे और अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए जनता के टैक्स के पैसों को कब तक बर्बाद करते रहेंगे? क्या सरकारी धन फिजूल खर्च के लिए है? चुनाव नजदीक आते ही रेवड़ी कल्चर हावी हो जाता है जिसमें जनता के टैक्स के पैसों से ही जनता को मुफ्तखोरी के नाम पर लोकलुभावन सपने दिखाए जाते हैं, जिसे देश की सुप्रीम कोर्ट ने भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया था। ऐसे तमाम प्रश्न तब तक अनसुलझे ही रहेंगे जब तक देश की सम्मानीय न्यायपालिका स्वयं कार्यपालिका के ऐसे फिजूल खर्च पर हस्तक्षेप कर लगाम नहीं कसेगी।
विमल अग्रवाल✍️संपादक
डीजी न्यूज डोंगरगढ़

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